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                                        श्री क्षत्रिय युवक संघ

KYS  LOGOसंसार में व्याप्त विष तत्व का विनाश कर अमृत तत्व का उत्कर्ष करने का कार्य भगवान ने क्षत्रिय को सौंपा एवं समय समय पर स्वयं क्षत्रिय के घर जन्म लेकर इस कार्य को कैसे किया जाये इसका आदर्श प्रस्तुत किया। लेकिन क्षत्रिय उस आदर्श से मुंह मोड़कर संसार के बहाव में बहकर स्वयं विष से आच्छादित होता गया। ऐसे में प्रथम आवश्यकता क्षत्रिय को स्वयं में व्याप्त विष का विनाश कर क्षात्र वृत्ति पर आरूढ़ होने की है। इस आवश्यकता की पूर्ति अभ्यास से संभव है। पूज्य तनसिंह जी ने इस आवश्यकता को समझा एवं 22 दिसम्बर 1946 को गीता में वर्णित अभ्यास एवं वैराग्य के मार्ग को अपनाकर श्री क्षत्रिय युवक संघ की स्थापना की। जयपुर के स्टेश्न रोड़ स्थित मलसीसर हाऊस में 25 दिसम्बर से 31 दिसम्बर 1946 में संघ का प्रथम प्रशिक्षण शिविर संपन्न हुआ। अपनी सामूहिक संस्कारमयी कर्म प्रणाली द्वारा संघ तब से अनवरत व्यक्तित्व चरित्र निर्माण में संलग्न है। व्यक्ति का चरित्र समाज चरित्र का आधार है। इस प्रकार सुशुप्त क्षात्र शक्ति को स्वयं की महता का भान कराकर सुसंस्कारित कर एक सूत्र में पिरोकर उसे सत्वोन्मुखी शक्ति का रूप देना श्री क्षत्रिय युवक संघ की साधना है। श्री क्षत्रिय युवक संघ उत्थान की नहीं सेवा की बात करता है और समाज को अपना उपास्य मानता है, उपास्य की उपासना की जाती है, वन्दना की जाती है, सेवा की जाती है। संघ जाति को भगवती स्वरूपा मानकर उसकी सेवा में संलग्न रहने हेतु प्रेरित करता है।

संघ-समाचार

आज का दर्शन

प्रेम का एकमात्र उद्गम परमेश्वर है। यह प्रेम ही मनुष्य के जीवन के शून्य को भर सकता है। जब हमें प्रेम की प्यास लगती है, वह असल में परमेश्वर की प्यास है। सौन्दर्य तो परमेश्वर का प्रतीक है। मनुष्य जब ईश्वर से विमुख होकर सौन्दर्यपान की चेष्टा करता है, तब वह अपने और संसार के भीतर जो गन्दगी है, उसी का पान करता है। - पूज्य श्री तनसिंह जी