संघ की साधना आत्मावलोकन और संयम की साधना है। संयम के बिना कोई भी प्राप्ति सुख नहीं प्रदान कर सकती। देश में स्वराज आ चुका है किंतु सुराज नहीं आ सका है इसका मूल कारण संयम का अभाव ही है। जब तक अन्यों के लिए बलिदान की प्रेरक क्षात्र भावना का विकास नहीं होता तब तक संसार का कल्याण संभव नहीं है। यह क्षात्र भावना हमारे रक्त की तासीर में समाहित है, अभी नष्ट नहीं हुई है। उसी को बचाने व विकसित करने का कार्य संघ कर रहा है। सामूहिक सत्संग से ही यह कार्य हो सकता है। सत्संग का अर्थ है सत्य का संग और सत्य हमारे भीतर स्थित है। अर्थात स्वयं के भीतर देखना, अपने स्वरूप को जानना ही वास्तविक सत्संग है, जिसका सामूहिक अभ्यास संघ करवा रहा है। माननीय संघप्रमुख श्री ने अपने जोधपुर प्रवास के दौरान शहर स्थित संघ के सम्भागीय कार्यालय ‘तनायन’ में 23 फरवरी को स्वयंसेवकों व सहयोगियों के मिलन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उपरोक्त बात कही। कार्यक्रम के दौरान विगत दो माह में संभाग के सभी प्रान्तों में हुए संघ कार्य की समीक्षा भी की गई तथा आगामी उच्च प्रशिक्षण शिविर हेतु योग्य स्वयंसेवकों के संबंध में चर्चा की गई।

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