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क्षात्रधर्म का कार्य है रक्षा करना। अपने आपकी रक्षा करना, अपने परिवार की रक्षा करना, अपने गाँव-शहर की रक्षा करना, अपने राष्ट्र की रक्षा करना। क्योंकि क्षात्र-धर्म देश, काल से निरपेक्ष धर्म है, अतः केवल राष्ट्र तक ही सीमित नहीं है। सम्पूर्ण विश्व में जो अराजकता है उससे निजात दिलाना भी कर्त्तव्य और धर्म हमारा ही है। अतः जो कुछ हम कर रहे हैं, वह केवल अपनी जाति के लिए ही नहीं कर रहे हैं, केवल हमारे राष्ट्र के लिए ही नहीं कर रहे हैं, सम्पूर्ण मानवता और प्राणीमात्र के लिए कर रहे हैं। यह बात हमें भली प्रकार अपने जीवन में उतार लेनी है। अन्य लोगों के यह बात समझ में बिल्कुल ही नहीं आई है, इसलिए इसे जातिगत संगठन कहा जाता है।

माननीय संघप्रमुखश्री (उच्च प्रशिक्षण शिविर, बेट द्वारिका(गुजरात) में 24 मई,2015 को प्रदत्त प्रभात संदेश से)

श्री क्षत्रिय युवक संघ से जुड़ने हेतु संपर्क सूत्र

संघ-समाचार

देशभर में उत्साह से मनाई पूज्य तनसिंह जी की 96वीं जयंती
January 27, 2020
उत्साह से मनाया 74वां स्थापना दिवस
December 24, 2019
शिमोगा (कर्नाटक) में शिविर सम्पन्न
November 18, 2019
आठ प्रशिक्षण शिविर सम्पन्न
November 13, 2019
तेरह प्रशिक्षण शिविर सम्पन्न
September 10, 2019
पांच दिन में तेरह प्रशिक्षण शिविर सम्पन्न
August 27, 2019
पांच राज्यों में पन्द्रह प्रशिक्षण शिविर सम्पन्न
August 21, 2019

आज का दर्शन

वैराग्य का अभिप्राय समस्त क्षणभंगुर पदार्थों में अनासक्ति होना है, किन्तु वैराग्य की तीव्र अवस्था भी कर्म विमुखता की ओर ले जाने वाली न हो, इसलिए गीता ने कर्म योग के बाद सांख्यदर्शन की शिक्षा दी है। वैसे देखा जाय तो कर्म और सांख्य योग दो विपरीत अथवा भिन्न साधनाएं नहीं हैं, कर्मयोग की विकसित अवस्था ही सांख्य योग है। यदि कर्मयोग की साधना सांख्य दर्शन की ओर नहीं ले जाती, तो वही योग साधन साध्य का स्वरूप बनकर प्रतिगामी बन जाता है। - पूज्य श्री तनसिंह जी