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क्षात्रधर्म का कार्य है रक्षा करना। अपने आपकी रक्षा करना, अपने परिवार की रक्षा करना, अपने गाँव-शहर की रक्षा करना, अपने राष्ट्र की रक्षा करना। क्योंकि क्षात्र-धर्म देश, काल से निरपेक्ष धर्म है, अतः केवल राष्ट्र तक ही सीमित नहीं है। सम्पूर्ण विश्व में जो अराजकता है उससे निजात दिलाना भी कर्त्तव्य और धर्म हमारा ही है। अतः जो कुछ हम कर रहे हैं, वह केवल अपनी जाति के लिए ही नहीं कर रहे हैं, केवल हमारे राष्ट्र के लिए ही नहीं कर रहे हैं, सम्पूर्ण मानवता और प्राणीमात्र के लिए कर रहे हैं। यह बात हमें भली प्रकार अपने जीवन में उतार लेनी है। अन्य लोगों के यह बात समझ में बिल्कुल ही नहीं आई है, इसलिए इसे जातिगत संगठन कहा जाता है।

माननीय संघप्रमुखश्री (उच्च प्रशिक्षण शिविर, बेट द्वारिका(गुजरात) में 24 मई,2015 को प्रदत्त प्रभात संदेश से)

श्री क्षत्रिय युवक संघ से जुड़ने हेतु संपर्क सूत्र

संघ-समाचार

चितहरणी (जालोर) में शिविर सम्पन्न
April 26, 2018
झुंझुनू में युवा मार्गदर्शन एवं संवाद कार्यशाला का आयोजन
April 15, 2018
बावकान, बालोतरा एवं सिवाणा में स्नेहमिलन सम्पन्न
April 9, 2018
देबारी (उदयपुर) में शिविर सम्पन्न
April 1, 2018
सुरावा, थराद, काणेटी, बाड़मेर एवं बापिणी में प्रांतीय स्नेहमिलन सम्पन्न
March 25, 2018
पाली में युवा मार्गदर्शन एवं संवाद कार्यशाला सम्पन्न
March 18, 2018
मुद्दों की समझ विकसित करना आवश्यक
March 5, 2018

आज का दर्शन

वैराग्य का अभिप्राय समस्त क्षणभंगुर पदार्थों में अनासक्ति होना है, किन्तु वैराग्य की तीव्र अवस्था भी कर्म विमुखता की ओर ले जाने वाली न हो, इसलिए गीता ने कर्म योग के बाद सांख्यदर्शन की शिक्षा दी है। वैसे देखा जाय तो कर्म और सांख्य योग दो विपरीत अथवा भिन्न साधनाएं नहीं हैं, कर्मयोग की विकसित अवस्था ही सांख्य योग है। यदि कर्मयोग की साधना सांख्य दर्शन की ओर नहीं ले जाती, तो वही योग साधन साध्य का स्वरूप बनकर प्रतिगामी बन जाता है। - पूज्य श्री तनसिंह जी